Aug 22, 2012

Tu meri rooh - Shair

कितनी मसाई करके तुम्हे पाया है ,
तू मेरी रूह है , तू ही तो मेरा साया है !

की इक झलक मिली तेरी, की कुछ और हुआ?
समझ नहीं की चेहरा तेरा या चाँद नज़र आया है

फिर छिड़ा ज़िक्र खूबसूरती का और फिर तेरा
छूप गया चाँद की इतना वो शरमाया है

है उस ज़िक्र के हर हर्फ़ पैर असर तेरा
मिलके हसीं ग़ज़ल का मतला बन आया है

अब इतना भी न शर्मा की हम समझ जाए
खुदा ने तुझको किसके लिए बनाया है

मसाई - Effort
रूह - Soul
ज़िक्र - Discussion
मतला - First stanza of the ghazal/ poem

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