उस की हसरत है की दिल से मिटा भी न सकू
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकू
दाल के ख़ाक मेरे खून पे कातिल ने कहा
कुछ यह मेहँदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकू
ज़ब्त कमबख्त ने और आ के गला घोटा है
के उसे हाल सुनाऊ तों सूना भी न सकू
उस के पहलू में जो लेजा के सुला दूँ दिल को
नींद ऐसी आये के उसे जगा भी न सकू
बेवफा लिखते है वों अपनी कलम से मुझ को
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकू
Wednesday, December 21, 2011
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